जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को अवमानना याचिका पर सुनवाई तो की और मौखिक निर्देश भी दिए, लेकिन उन निर्देश को दिल्ली पुलिस दिनभर हवा में उड़ाती रही।
सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को हिरासत में नहीं लेने को कहा,लेकिन पुलिस लगातार लोगों को हिरासत में लेती रही। वहीं वकीलों पर कोई कार्रवाई नहीं करने की बात कही। इसके बावजूद वकीलों के साथ में धक्का मुक्की और हिरासत में लेने का काम जारी रहा। इतना ही नहीं पत्रकारों को चुन चुन कर खींच खींचकर गाड़ियों में ले जाया गया। ऐसे नजारे दिनभर नजर आते रहे।
इससे पहले रविवार को सुप्रीम कोर्ट ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रोटेस्ट करने वालों पर सरकार की कार्रवाई के खिलाफ कई याचिकाओं पर रविवार को सुनवाई की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की बेंच ने दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स द्वारा प्रोटेस्ट करने वालों को हिरासत में लेने के खिलाफ याचिकाओं और जानबूझकर ऑर्डर न मानने के आरोप में एक अवमानना याचिका पर सुनवाई पर की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि कानून के बनाए गए प्रोसीजर के सख्ती से पालन के अलावा किसी भी व्यक्ति को हिरासत में न लिया जाए और इस बात पर जोर दिया कि रोक वाले इलाकों के बाहर शांतिपूर्ण, बिना हथियार के जमावड़े को मनमाने ढंग से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
बेंच ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सर्विस नॉर्मल तरीके से चलती रहें, जब तक कि पब्लिक ऑर्डर में गड़बड़ी की वजह से पाबंदियों की ज़रूरत न हो, जैसा कि संविधान के आर्टिकल 19(2) के तहत सोचा गया है। लोगों के आने-जाने के बारे में, बेंच ने निर्देश दिया कि ट्रैफिक नियमों के तहत शहर में फ्री मूवमेंट की इजाज़त दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हर जगह बैरिकेडिंग के पक्ष में नहीं है और निर्देश दिया कि कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक की दूसरी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग का तुरंत रिव्यू किया जाना चाहिए। बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि इंटरनेट सर्विस में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए।
बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के इस भरोसे पर ध्यान दिया कि दिल्ली मेट्रो रेलवे पूरी तरह से चालू है और कल रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हैं। मेहता ने बेंच को यह भी भरोसा दिलाया कि ट्रेन सर्विस चालू हैं और इंटरनेट कनेक्टिविटी फिर से शुरू हो गई है।
बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगर सुप्रीम कोर्ट के आस-पास के इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू करने से जुड़ा बोर्ड पहले से नहीं हटाया गया है, तो उसे हटा दें, ताकि न्याय मिलने में किसी भी तरह की आशंका न हो। बेंच वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की कंटेम्प्ट पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के बावजूद अधिकारी दिल्ली मेट्रो स्टेशन बंद कर रहे हैं और ट्रेन सर्विस पर रोक लगा रहे हैं।
इससे पहले कोर्ट ने कहा, ‘हमारे सामने दो मामले हैं। कुछ वकील फाइल की गई याचिकाओं का अनलिस्टेड मेंशन करना चाहते हैं। हमारा मकसद दाएं से बाएं जाना और हर पार्टी को सुनने का मौका देना है।’ तभी वकीलों ने इन मुद्दों पर स्पेशल सुनवाई करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद दिया, तो जस्टिस बागची ने कहा, ‘हमें धन्यवाद देने की कोई जरूरत नहीं है। हम हमेशा देश की सेवा में हैं।’ सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने हिरासत और सेक्शन 163 लगाने के आदेश के खिलाफ एक याचिका पर अपनी बात रखी। सिब्बल ने कहा, ‘वे लोगों को ट्रेन वगैरह से उठा रहे हैं। फिर इंटरनेट सस्पेंड करने का मुद्दा उठाया।
सीनियर एडवोकेट शाहदान फरासत ने उस कथित तरीके के खिलाफ दलीलें दीं जिसमें प्रदर्शनकारियों को घसीटकर बस में डाला गया। मीडिया में शाहदान फरासत को भी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया था। सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन ने कहा, ‘नागरिकों ने शहर में घूमने का अधिकार खो दिया है।’ सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन ने वकीलों को हिरासत में लेने का मुद्दा उठाया। सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उन्होंने जंतर-मंतर के बाहर वकीलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के वीडियो रिकॉर्ड पर लाए हैं। उन्होंने कोर्ट से वकीलों और दूसरों के खिलाफ हुई हिंसा के वीडियो देखने की अपील की।
शंकरनारायणन ने कोर्ट से शहर में फ्री मूवमेंट बहाल करने और सभी बैरिकेड हटाने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने कहा कि बिना बैज वाले लोग कल भी मौजूद रहे और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। सीनियर वकील संजय हेगड़े ने कहा कि वकीलों को उनके क्लाइंट्स की मदद करने से रोका जा रहा है, और पुलिस ने उन्हें एफआईआर करने की धमकी दी गई।
सुप्रीम कोर्ट डिटेंशन और दिल्ली मेट्रो बंद होने से जुड़ी पिटीशन पर सुनवाई की। एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कुछ वकील शांति से चल रहे थे, लेकिन बिना बैज वाले पुलिस अधिकारियों ने उन्हें एक वैन में धकेल दिया। सीनियर एडवोकेट शोएब आलम ने कहा कि लोगों को ट्रेनों में डिटेन किया गया। पैसेंजर को बाहर निकाला गया। लोगों के घरों पर रेड की जा गई ताकि वे प्रोटेस्ट साइट पर न पहुंचें। आलम ने कहा कि लोगों ने कोई पाप नहीं किया है और लोगों के प्रोटेस्ट करने के अधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है, पूर्व सीएम सहित 6000-7000 लोगों को डिटेन किया गया।
जस्टिस बागची ने कहा कि वह संबंधित अथॉरिटीज से मंगलवार तक मेट्रो स्टेशन बंद करने पर एक रिपोर्ट जमा करने के लिए कह सकते हैं। सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी का तर्क है कि क्या राज्य ने इमरजेंसी लगा दी है ? गुरुस्वामी ने कहा कि नागरिकों के शांति से विरोध करने के अधिकार को रोक दिया गया है और उन्होंने जोर देकर कहा कि पिछली बार ऐसा 50 साल पहले इमरजेंसी के दौरान ऐसा हुआ था। सीनियर वकील कपिल सिब्बल, शादान फ़रासत, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी और एन. हरिहरन ने याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से दलीलें दीं।
बेंच ने त्रिपाठी की अवमानना याचिका पर केंद्र से मंगलवार तक जवाब मांगा। बेंच ने कहा कि उन्हें विरोध करने के अधिकार से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन विरोध तय प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। एक वकील ने दलील दी कि आर्टिकल 19(1)(a) के तहत मिला अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) के अधीन है। सिब्बल ने एक अंतरिम आदेश की मांग की कि पूरे शहर में इंटरनेट सेवा बहाल की जाए और किसी को हिरासत में न लिया जाए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ याचिका में बताए गए सभी लोगों को दोपहर 2 बजे साइट से हटा दिया गया था और शाम करीब 6 बजे रिहा कर दिया गया। मेहता ने कहा, “10 अक्टूबर को मेट्रो सेवा में कोई कटौती नहीं की गई थी। 10 अक्टूबर को मेट्रो संचालन की कुल मात्रा में कोई कमी नहीं हुई थी। मेट्रो के पूरे रूट पर 303 स्टेशन हैं. 303 में से केवल 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट के नियम लागू किए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि कल रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खुले थे और आज भी सभी मेट्रो स्टेशन खुले हैं।
बेंच ने खुले और बंद मेट्रो स्टेशनों की तस्वीरें दिखाने को कहा, ताकि वहां तक पहुंचने की सुविधा और नियमों की प्रकृति को समझा जा सके। बेंच ने 9 अक्टूबर के अपने आदेश का मंगलवार तक पालन करने को कहा और साथ ही कहा कि इस बीच, मेट्रो का कामकाज सामान्य समय-सारणी के अनुसार जारी रहना चाहिए, बशर्ते आर्टिकल 9 के क्लॉज़ 2 के तहत सार्वजनिक व्यवस्था की शर्त का पालन हो।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। किसी भी वकील को अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने में किसी भी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए। शहर में इंटरनेट सुविधा को सामान्य रूप से बहाल किया जाना चाहिए। मेहता ने कहा कि इंटरनेट तो कल ही बहाल कर दिया गया था। बेंच ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि वे सिस्टम में मिस्टर सिब्बल का भरोसा बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। शनिवार को सिब्बल ने कहा, “मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाकर थक गया हूं। मैं अपनी बात कह रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फ़ायदा है। मुझे सुप्रीम कोर्ट से ज़्यादा उम्मीद नहीं है।