उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, कहकर रुखसत हुए बशीर साहब

भोपाल। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए। और दुश्मनी जम कर करो,लेकिन ये गुंजाइश रहे,जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों ,जैसे शेर गढ़ने वाले मशहूर शायर व पद्म श्री डॉ बशीर बद्र का इंतकाल हो गया। 91 बरस की उम्र में उन्होंने भोपाल के अपने घर में आखिरी सांस ली। बशीर साहब की पत्नी राहत बद्र ने ही सोशल मीडिया अकाउंट से ये स्टोरी साझा की और लिखा ‘बशीर साहब लेफ्ट अस…प्रेयर्स’।

बीते कई वर्षों से डिमेशिया से गुजर रहे बशीर साहब ने मुशायरों से भी किनारा कर लिया था। पत्नी डॉ. राहत बद्र और बेटे तैयब की देखभाल की वजह से बशीर साहब पूरी तरह याददाश्त चली जाने के बाद भी वो अपने चाहने वालों से लगातार मिलते थे।

बशीर साहब ने भोपाल में बस जाने के बाद फतेहगढ़ के जिस बशीर मंज़िल को अपना आशियाना बनाया। जिस घर में देश-दुनिया के लोग उनसे मुलाकात के लिए आया करते थे। उसी घर के कमरे में बशीर साहब ने आखिरी सांस ली। हालांकि बीते कई साल से उन्होंने डिमेशिया की वजह से मुशायरों में जाना तकरीबन बंद कर दिया था। यहां तक की मुलाकात के लिए भी जो लोग पहुंचते थे। बशीर साहब की याददाश्त से बाहर हुए उन लोगों को वे पहचान नहीं पाते थे, लेकिन उनकी पत्नी डॉ राहत बद्र और बेटे तैय्यब ने उनकी इतनी देखभाल की कि बशीर साहब डिमेशिया से पूरी तरह ग्रसित हो जाने के बाद भी 91 बरस की उम्र तक हमारे बीच रहे।
60 साल मुशायरों की दाद लूटने वाले एक शायर बशीर बद्र साहब लफ्ज़ों के जादूगर थे, लेकिन डिमेंशिया ने उन्हें ऐसा घेरा कि आज अपनी बात मुकम्मिल करने अल्फाज़ तलाशते थे। उनके आखिरी दिनों में लफ्ज़ जुबान का साथ छोड़ने लगे थे, लेकिन डॉ राहत बद्र और उनके बेटे तैय्यब डिमेशिया से लड़ने की कोशिश में बशीर साहब के साथ खड़े होते। बशीर साहब को बुलंदी वाले गुजरे दिन याद दिलाने उनके कानों में मिसरा फूंकते थे, उन्हें याद दिलाते थे। कई-कई बार ऐसा भी होता था कि बशीर साहब बोल पड़ते थे। वाह वाह और इरशाद के कई दौर चलते थे।

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