सरकारें हिंदुओं से वोट लेती हैं, हिंदू हितों की रक्षा करने से बचती हैं

जयपुर। एक दिवसीय जयपुर प्रवास पर पहुंचे जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मीडिया से विस्तृत बातचीत करते हुए धर्म, राजनीति, गौ संरक्षण, राष्ट्रीय परिदृश्य तथा वैश्विक परिस्थितियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे लंबे समय से जिन मुद्दों को उठा रहे हैं, उन पर सरकार अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर रही है, जिसके कारण उन्हें खुलकर आवाज उठानी पड़ी है।
शंकराचार्य ने कहा कि वर्तमान समय में सरकारें हिंदुओं से वोट तो लेती हैं, लेकिन हिंदू हितों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाने से बचती हैं। उन्होंने गौ संरक्षण के विषय को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि वे लगातार गाय की रक्षा की बात कर रहे हैं, लेकिन इसके विपरीत स्थिति यह है कि गौ हत्याओं को रोकने के लिए प्रभावी प्रयास दिखाई नहीं देते। उन्होंने आरोप लगाया कि इस विषय को उठाने के कारण कुछ लोगों को असहजता हो रही है और इसी वजह से उनके खिलाफ वातावरण बनाया जा रहा है।
मीडिया द्वारा जान से मारने की धमकियों के सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस प्रकार के संदेश और वॉइस मैसेज मिलने की जानकारी उनके कार्यालय के माध्यम से प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि इस मामले में पुलिस और प्रशासन अपना कार्य करेंगे, लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से इन धमकियों से भयभीत नहीं हैं। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि “गौ माता की रक्षा के लिए उठाई गई आवाज से हम पीछे हटने वाले नहीं हैं, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।” उन्होंने यह भी कहा कि धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना ही जीवन का उद्देश्य है।
विश्व में बढ़ती अशांति और युद्धों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आज वैश्विक स्तर पर संघर्ष का मूल कारण नैतिक मूल्यों की अनदेखी है। उन्होंने कहा कि विद्वानों और चिंतकों का दायित्व है कि वे सही और गलत का स्पष्ट निर्धारण करें, लेकिन वर्तमान में यह भूमिका कमजोर पड़ती नजर आ रही है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में उत्तरदायित्व और नैतिकता का भाव नहीं होगा, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है।
देश की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि आज धर्म का स्वरूप काफी हद तक दिखावे तक सीमित हो गया है। बड़े-बड़े आयोजन, मंच, प्रकाश और भीड़ के बीच धर्म के मूल तत्व—सत्य, धैर्य, करुणा और क्षमा—कम होते जा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बिना मूल सामग्री के भोजन तैयार नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना मूल तत्वों के धर्म भी अधूरा है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे धर्म को केवल आयोजन तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने आचरण और जीवन में उतारें।
हिंदू समाज में एकता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि यह कहना उचित नहीं है कि हिंदू आपस में लड़ रहे हैं। उनके अनुसार वर्तमान संघर्ष “असली और नकली” के बीच है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति हिंदू सिद्धांतों, परंपराओं और हितों के लिए दृढ़ता से खड़ा होगा, वही सच्चा हिंदू कहलाएगा, जबकि केवल नाम या वेशभूषा से हिंदू होने का दावा करने वाले लोग वास्तविक कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
उन्होंने यह भी कहा कि समाज में हर व्यक्ति को अपने कर्मों का आकलन करना चाहिए—कितना धर्म और कितना अधर्म किया, इसका लेखा-जोखा होना आवश्यक है। यही सच्चे धर्म की पहचान है।
अंत में शंकराचार्य ने दोहराया कि वे अपने दायित्व का निर्वहन करते रहेंगे और किसी भी प्रकार के दबाव, विरोध या धमकी से विचलित नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा और समाज को जागरूक करने के लिए उनका अभियान निरंतर जारी रहेगा।

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