पटना / दिल्ली। बिहार की राजनीति वर्तमान में अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने दो दशकों तक बिहार की सत्ता की धुरी बने रहकर ‘सुशासन बाबू’ की पहचान बनाई, अब राज्य की सक्रिय राजनीति से विदा लेकर देश की संसद के उच्च सदन, राज्यसभा की ओर रुख करने के इस कदम ने बिहार की सियासत में एक बड़े शून्य और कई अनुत्तरित सवालों को जन्म दिया है।
नीतीश कुमार का राज्यसभा प्रस्थान: एक युग का अंत
नीतीश कुमार ने 10 अप्रैल 2026 को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली। इसके साथ ही उनके करीब 20 साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल पर विराम लग गया है। यह निर्णय अचानक नहीं था। उन्होंने मार्च 2026 में ही अपनी इच्छा जाहिर की थी कि वे अपने संसदीय जीवन में विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ-साथ संसद के भी दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) का सदस्य बनने का गौरव प्राप्त करना चाहते हैं।
कौन बनेगा अगला मुख्यमंत्री? (प्रमुख दावेदार)
नीतीश कुमार के जाने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए NDA (भाजपा-जदयू) के भीतर गहन मंथन चल रहा है। 14 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री के संभावित इस्तीफे और नए नेता के चयन के लिए विधायक दल की बैठक होगी । रेस में निम्नलिखित नाम सबसे आगे हैं:
सम्राट चौधरी (भाजपा):वर्तमान उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार का सबसे प्रबल उत्तराधिकारी माना जा रहा है। हाल ही में ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से उनके कंधे पर हाथ रखकर जनता से उन्हें समर्थन देने की अपील की थी, जिसे एक स्पष्ट ‘राजनीतिक उत्तराधिकार’ के संकेत के रूप में देखा गया।
नित्यानंद राय (भाजपा): केंद्रीय राजनीति में सक्रिय नित्यानंद राय का नाम भी चर्चा में है, खासकर यदि भाजपा बिहार में पूरी तरह से अपने नेतृत्व वाली सरकार का चेहरा बदलना चाहती है।
विजय कुमार सिन्हा (भाजपा): वर्तमान उप-मुख्यमंत्री और अनुभवी नेता के रूप में वे भी एक मजबूत विकल्प हैं।
जदयू की ओर से चौंकाने वाले नाम:
चर्चा यह भी है कि सत्ता के संतुलन के लिए निशांत कुमार (नीतीश कुमार के पुत्र) को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, हालांकि नीतीश कुमार हमेशा परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं।
नीतीश के बाद bihar की सियासत का भविष्य
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार की राजनीति में तीन प्रमुख बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
भाजपा का पूर्ण वर्चस्व
नीतीश कुमार के हटते ही बिहार में भाजपा अब “बड़े भाई” की भूमिका से आगे बढ़कर “अकेले इंजन” वाली शक्ति बनने की कोशिश करेगी। जदयू के कई विधायकों के टूटने या भाजपा में विलय की अटकलें भी तेज हैं।
विपक्ष की आक्रामकता
नेता प्रतिपक्ष **तेजस्वी यादव** ने इस घटनाक्रम को ‘साजिश’ करार दिया है। उनका आरोप है कि भाजपा ने जदयू को खत्म करने के लिए नीतीश कुमार को दिल्ली भेज दिया है। विपक्ष अब “जनादेश के अपमान” को मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।
नीतीश कुमार की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘सात निश्चय’ जैसी योजनाएं उनके उत्तराधिकारी के लिए एक विरासत भी हैं और चुनौती भी। नया मुख्यमंत्री इन योजनाओं को कैसे आगे बढ़ाता है, इसी पर 2030 के अगले विधानसभा चुनाव की नींव टिकेगी।
कुल मिलाकर बिहार की सियासत अब ‘नीतीश युग’ से निकलकर ‘पोस्ट-नीतीश युग’ में प्रवेश कर रही है। आने वाले 48 घंटे राज्य के राजनीतिक भविष्य के लिए अत्यंत निर्णायक होंगे। सत्ता की चाबी भाजपा के हाथों में जाना लगभग तय लग रहा है, लेकिन चेहरा कौन होगा, इसका आधिकारिक 14 अप्रैल ko जल्द ही पटना में होने वाली NDA की बैठक में होगा।