नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी को आज उसे समय झटका लगा जब राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की खली की गई बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को जान स्वराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने 19,853 वोटो के बड़े अंतर से हरा दिया।
वही मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के उम्मीदवार को 6000 से ज्यादा मतों से पराजित किया। गुजरात की मंजूर सीट पर भाजपा उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की खली की गई बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव सीट का हाई प्रोफाइल मुकाबला था जिस पर पूरे देश की नजर थी। प्रशांत किशोर ने यह चुनाव जीतकर भाजपा को तगड़ा झटका दिया है।
पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने बिहार की सियासत में भूचाल ला दिया है। भाजपा के सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को करीब 19 हजार वोटों के बड़े अंतर से मात दी।
31 राउंड की इस लंबी मतगणना के बाद आया यह परिणाम भाजपा के लिए झटका इसलिए भी है,क्योंकि यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की परंपरागत सीट रही है। उनके पिता नवनीत किशोर प्रसाद सिन्हा और खुद नितिन नबीन ने दशकों तक यहां भाजपा का झंडा बुलंद रखा था। नितिन नबीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन किला नहीं बच पाया।
इस अप्रत्याशित हार के बाद भाजपा के भीतर उच्च स्तर पर मंथन का दौर शुरू हो गया है। पार्टी सूत्रों और अंदरखाने के विश्लेषणों में यह बात साफ तौर पर उभर कर आ रही है कि इस चुनाव में मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल ने एक बड़ा रणनीतिक ‘खेला’ कर दिया है। राजद ने अपने उम्मीदवार रेखा गुप्ता के मजबूत आधार और उनके पारंपरिक वोट बैंक का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बार प्रशांत किशोर की तरफ शिफ्ट करवा दिया। इस वजह से भाजपा का पारंपरिक चुनावी गणित और सामाजिक समीकरण पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
इस उपचुनाव में करीब 34 प्रतिशत का बेहद कम मतदान दर्ज किया गया था। बांकीपुर मुख्य रूप से शहरी मध्यवर्गीय और उच्च जातियों, खासकर कायस्थ समुदाय के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता रहा है। कम मतदान और आए नतीजों से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा के इस पारंपरिक कोर वोटर और शहरी मध्यवर्ग के भीतर स्थानीय स्तर पर कुछ असंतोष था, जिसका फायदा जन सुराज को मिला।