रिश्तों के ताने-बाने में पनपती विकृतियां

आलेख…
रिश्तों के ताने-बाने में पनपती विकृतियां
– रिश्तों में हो रहे खूनी संघर्षों के पीछे मुख्य कारण अत्यधिक भौतिकवादी सोच, स्वार्थ, संपत्ति का लालच और तात्कालिक क्रोध का होना है। समाज को इस विकट स्थिति से उबारने के लिए मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और कानूनी सभी स्तर पर एकजुटता लानी होगी, तभी सुधार संभव है।

हाल ही में कानपुर में एक पिता ने अपनी 11 साल की दो मासूम जुड़वां बेटियों की निर्मम हत्या कर दी। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन समाज में पनपती विकृतियां अब आपसी रिश्तों पर भी हावी होती प्रतीत हो रही हैं। यह बर्बादी की एक नई कहानी है, जो अब धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। ये अपने-आप में पहली घटना नहीं है, बल्कि ऐसे सैकड़ों मामले दरकते रिश्तों की अपनी दास्तां बयान करते हैं। जिन रिश्तों और संबंधों को किसी समय प्रेम, विश्वास और सुरक्षा से बांधा जाता था, वही अब स्वार्थपरक अनैतिक आचरण में लिप्त हो कलयुग कहे जाने वाले समय की कालिख बनने का काम कर रहे हैं। यह हमें सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि आखिर ये समाज कहा जा रहा है और हम कहां जा रहे हैं?
कानपुर घटनाक्रम में हत्या के पीछे तनाव और नशे को जांच का आधार बनाया गया है, लेकिन देश का कोई भी कोना ऐसे मामलों से शायद ही अब अछूता हो। इससे पहले दिल्ली के नोएडा में आरुषि तलवार और गुरुग्राम में राधिका यादव की अपने ही पिता द्वारा जघन्य हत्या जैसे मामले भरोसे के इन रिश्तों की कहानी बयां करते हैं। राजस्थान के अलवर और मेरठ में पत्नी के प्रेमी संग पति की हत्या, लखनऊ में बेटे द्वारा कारोबारी पिता की हत्या कर टुकड़े नीले ड्रम में रखने जैसे दिल दहला देने वाले प्रकरणों ने जनमानस को हिला कर रख दिया है।
असल में अब समाज में रिश्तों का कत्ल एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिनके स्वरूप अलग-अलग देखे जा सकते हैं। जहां आपसी विवाद, प्रॉपर्टी और पैसा, अनैतिक संबंध, अहंकार और भरोसे की कमी के कारण भाई-भाई, बेटे-पिता, पिता-बेटी और पति-पत्नी के रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। पिछले सालों में बढ़ने वाला नशे का प्रचलन भी इसका एक बड़ा कारण बन रहा है, जिसमें व्यक्ति अपराध करने से पहले यह नहीं समझ पाता कि सामने सगे-संबंधी हैं या कोई और। ऐसा लगता है जैसे कि रिश्तों का कत्ल करने की होड़ मची हुई है। ऐसा करने में कोई भी रिश्ता किसी भी रिश्ते से पीछे नहीं है।
इस तरह की अनैतिक घटनाएं जैसे सगे-संबंधियों को मार देना या संपत्ति के लिए अपनों की हत्या सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं। अत्यधिक स्वार्थ, लालच और अहंकार के कारण व्यक्ति अपनों के प्रति संवेदनहीन हो रहा है। रिश्तों में प्यार और भरोसे की कमी के कारण वे बोझ बन कर अंततः टूट जाते हैं। आपसी सम्मान और प्रेम में कमी आ रही है, जिससे रिश्तों की परिभाषा बदल रही है और सामाजिक सौहार्द खत्म हो रहा है। परिणाम स्वरूप परिवार तबाह हो रहे हैं और समाज शर्मसार हो रहा है। इस तरह के मामले बताते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह में इंसानियत खत्म हो रही है।
देश में हर रोज कहीं न कहीं हो रही इस तरह की घटनाएं बता रही हैं कि परिवार और समाज में सुरक्षा का भाव दिनों-दिन कम हो रहा है। तनाव के चलते रिश्तों में खटास होने से व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है। मानवता पर सवाल उठने लगे हैं। प्यार और स्नेह की जगह अब नफरत ले रही है, जो समाज के लिए खतरनाक है। यह आवश्यक है कि हम अपने रिश्तों में आपसी विश्वास, समझ और प्रेम को बहाल करें, ताकि समाज में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहे।
अब जरूरी है कि परिवार में खुलकर और ईमानदारी से बात करने की संस्कृति विकसित करनी चाहिए, क्योंकि अक्सर संवाद की कमी ही हिंसा का कारण बनती है। विवादों को सुलझाने में बुजुर्गों व प्रबुद्ध लोगों की भी इसमें मदद ली जा सकती है। इसके साथ ही संयुक्त परिवार व्यवस्था को पुनर्जीवित किया जाना जरूरी है। परिवार में महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करना होगा। पितृसत्तात्मक सोच और पुरुष वर्चस्व को खत्म करना भी जरूरी है। निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि रिश्तों में हो रहे खूनी संघर्षों के पीछे मुख्य कारण अत्यधिक भौतिकवादी सोच, स्वार्थ, संपत्ति का लालच और तात्कालिक क्रोध का होना है। समाज को इस विकट स्थिति से उबारने के लिए मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और कानूनी सभी स्तर पर एकजुटता लानी होगी, तभी सुधार संभव है। ऐसा करने के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।

डॉ. मोनिका शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *