जयपुर राजपरिवार को सुप्रीम कोर्ट से झटका

जयपुर। विकास प्राधिकरण (JDA) को ₹400 करोड़ से अधिक मूल्य की जयपुर शहर की बेशकीमती जमीन से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है।

सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर के पूर्व महाराजा ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह (दिवंगत) एवं उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ जेडीए द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके चलते ट्रायल कोर्ट का डिक्री बिना गुण-दोष के परीक्षण के अंतिम रूप ले चुकी थी।

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट द्वारा तकनीकी आधारों पर अपील पर विचार से इनकार करना न्यायसंगत नहीं था और इस कारण सार्वजनिक महत्व की भूमि से जुड़े गंभीर विवाद का निस्तारण बिना मेरिट पर सुनवाई के नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट को आदेश दिए कि वह JDA की लंबित प्रथम अपील को बहाल कर चार सप्ताह के भीतर मेरिट पर निर्णय करे और इसकी अनुपालना रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय स्तर पर सुनवाई के बिना ट्रायल कोर्ट के आदेश को अंतिम मान लेना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े सार्वजनिक हित और मूल्यवान सरकारी भूमि से जुड़े विवाद को केवल तकनीकी आधारों पर खारिज करना स्वीकार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में अनुच्छेद 363 के तहत संवैधानिक प्रतिबंध, पूर्ण हो चुके भूमि अधिग्रहण, दशकों पुराने राजस्व रिकॉर्ड और सार्वजनिक विकास जैसे गंभीर प्रश्न शामिल हैं, जिनका परीक्षण आवश्यक है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने जेडीए द्वारा मामला सुप्रीम कोर्ट तक लाने पर ₹50,000 की कोस्ट भी लगाई है, ताकि प्रक्रिया में हुई देरी के लिए उत्तरदायित्व तय किया जा सके।

जेडीए की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज और राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा उपस्थित रहे। वहीं, महाराजा परिवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन पाहवा ने पक्ष रखा।

यह विवाद जयपुर शहर के हृदय स्थल में स्थित गांव हाथरोई की बेशकीमती जमीन से जुड़ा है, जिसकी अनुमानित कीमत ₹400 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। इस भूमि पर वर्तमान में शुभम एन्क्लेव, राज महल रेजिडेंसी, सी-स्कीम जैसे प्रमुख आवासीय क्षेत्र विकसित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त यहां स्कूल, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक अवसंरचनाएं भी मौजूद हैं। राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि लंबे समय से सरकार की “सिवायचक” भूमि के रूप में दर्ज रही है।
वर्ष 2005 में जयपुर के पूर्व महाराजा परिवार ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दावा किया कि यह भूमि उनकी निजी संपत्ति है और 1949 में जयपुर रियासत के भारत संघ में विलय के समय हुए समझौते (Covenant) के तहत मान्यता प्राप्त निजी संपत्ति का हिस्सा है। परिवार ने यह भी दावा किया कि यह भूमि “प्रिंसेज़ हाउस” और “प्रिंसेज़ क्लब” से संबद्ध निजी संपत्ति है।

जयपुर विकास प्राधिकरण ने इस दावे का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि उक्त भूमि न तो 1949 के समझौते की निजी संपत्तियों की सूची में शामिल थी और न ही कभी निजी संपत्ति के रूप में दर्ज रही।

जेडीए ने यह भी बताया कि भूमि के बड़े हिस्से का अधिग्रहण वर्ष 1993 से 1995 के बीच विधि सम्मत तरीके से किया जा चुका है, मुआवजा दिया गया है और उस पर सार्वजनिक विकास कार्य भी पूरे हो चुके हैं।

ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट में अटका मामला
इसके बावजूद 24 नवंबर 2011 को ट्रायल कोर्ट ने महाराजा परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें भूमि का स्वामी घोषित कर दिया, राज्य के पक्ष में दर्ज पुराने राजस्व रिकॉर्ड को निरस्त कर दिया और जेडीए को भूमि में हस्तक्षेप से रोक दिया।

इस फैसले के खिलाफ जेडीए ने वर्ष 2012 में राजस्थान हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की। यह अपील वर्षों तक लंबित रही और नवंबर 2023 में गैर-हाजिरी के आधार पर खारिज कर दी गई। बाद में सीमित लागत पर अपील बहाल तो हुई, लेकिन प्रक्रियागत कमियों के चलते अंततः हाईकोर्ट ने 15 सितंबर 2025 को हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

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