कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति, अब वह उदाहरण बनने जा रही है, जो कभी हिंदुस्तान में नहीं देखा गया। ना सिर्फ तृणमूल कांग्रेस को तोड़ दिया गया,बल्कि अब पूरी तरह से खत्म करने की और कदम बढ़ाते हुए बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष से हटा दिया है। वहीं अभिषेक बनर्जी, जो ममता बनर्जी के भतीजे हैं,को सस्पेंड कर दिया गया है। यानी की यह तो तय है कि यह सिर्फ चुनाव हारने के बाद नहीं हो रहा,बल्कि इसकी रूपरेखा तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए बना ली गई थी और सिर्फ चुनावी हार का इंतजार था। लगता इस चुनावी हार की पटकथा भी कई महीनो पहले तैयार कर दी गई थी।
सोमवार को कोलकाता के न्यू टाउन में एक लग्जरी होटल में रीताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने ममता बनर्जी को हटाते हुए पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली है। बैठक में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए बागी विधायक और पूर्व जनप्रतिनिधि शामिल हुए इससे साफ हो गया कि तृणमूल संगठन पूरी तरह से बिखर चुका है।
कोलकाता नगर निगम के 50 से ज्यादा पूर्व तृणमूल पार्षदों के अलावा, मुर्शिदाबाद और बरहामपुर के कई पूर्व जनप्रतिनिधि बैठक में शामिल हुए और बागी गुट के साथ जुड़ गए। असीम बसु, जुई बिस्वास और तारक सिंह जैसे जाने-पहचाने चेहरों के साथ, फिरहाद हकीम, जावेद खान, अरूप रॉय और पूर्व परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती जैसे बड़े नेता भी मौजूद थे।
सबसे खास बात यह है कि मीटिंग हॉल में पार्टी का चुनाव चिन्ह तो था, लेकिन ममता बनर्जी की फोटो या उनके नाम का कोई निशान नहीं था। इसी बड़ी बैठक में अभिषेक को सस्पेंड करने के फैसले पर भी मुहर लगाई गई। बैठक में मौजूद बागी गुट के एक नेता ने कहा कि संगठन के अंदर लंबे समय से चली आ रही शिकायतों की वजह से आज अभिषेक बनर्जी को पार्टी से एकमत से सस्पेंड करने का फैसला लिया गया।
इसी के साथ उलुबेरिया पूर्व के विधायक रीताब्रत बनर्जी की लीडरशिप में बने ‘नबा तृणमूल ब्लॉक’ ने अपनी नई कमेटी का ऐलान करते हुए हावड़ा सेंट्रल से विधायक अरूप रॉय को ममता की जगह चेयरमैन चुना गया है। जावेद खान, संदीपन साहा, रीताब्रत बनर्जी और सबीना यास्मीन इस नई बनी कमेटी में महासचिव के पद पर हैं, जबकि अख्तरुज्जमां को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। वहीं, अरूप बिस्वास, फिरहाद हकीम और रथिन घोष को उपाध्यक्ष बनाया गया है।
असंतुष्टों का कहना है कि नई तृणमूल’ की बागडोर अब पूरी तरह से हमारे हाथ में है; इसलिए, संगठन को नया रूप देने के लिए शीर्ष पदों पर यह फेरबदल किया गया। हालांकि, इस नए संगठन के तेजी से बनने के बाद, राजनीतिक हलकों में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या असंतुष्ट अब पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर कानूनी दावा करेंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बगावत के बीज कुछ समय पहले ही बो दिए गए थे। राज्य में बीजेपी सरकार बनने के बाद, 70 विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक प्रस्ताव विधानसभा में पेश किया गया, जिसमें सोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव था। हालांकि, एंटाली के विधायक संदीपन साहा और रीताब्रत बनर्जी ने सबसे पहले हस्ताक्षर पर खुली आपत्ति जताई।
स्पीकर के पास जाकर उन्होंने शिकायत की थी कि हमने उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। विधानसभा में पेश किए गए प्रस्ताव पर हमारे हस्ताक्षर पूरी तरह से जाली थे।
आखिरकार मामला कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचा, और स्पीकर ने आखिरकार रीताब्रत को विपक्ष का लीडर मान लिया। तब से बड़े नेता एक-एक करके ममता बनर्जी को छोड़कर रीताब्रत के कैंप में शामिल हो रहे हैं।
इस बीच अभिषेक बनर्जी के खिलाफ फाल्टा पुलिस स्टेशन में एक नई FIR दर्ज कराई है, जिसमें अम्फान राहत फंड के बंटवारे में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है। उन्होंने पहले भी बिष्णुपुर पुलिस स्टेशन में ऐसे ही आरोप लगाए थे। शिकायत में मछुआरों को राहत और घर बनाने के लिए दिए गए सरकारी फंड में ₹47 करोड़ से ज्यादा के बंटवारे में गड़बड़ी का आरोप है। शिकायत में बीजेपी नेता बॉबी ने कहा कि लाभार्थी सूची में गलत एंट्री की गई हैं, और एक ही परिवार के कई सदस्यों के नाम शामिल करके सरकारी फंड के गलत इस्तेमाल की पूरी संभावना है। हमने इस भ्रष्टाचार की जड़ों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच की मांग की है। अभिषेक के साथ, जहांगीर खान जो उनके करीबी सहयोगी माने जाते हैं और फाल्टा के तत्कालीन विधायक शंकर कुमार नस्कर का नाम भी इस हाई-प्रोफाइल मामले में शामिल है