राजस्थान की नदियों में प्रदूषण,रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी गठित करने का निर्देश

जोधपुर/नई दिल्ली / जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की नदियों में प्रदूषण को लेकर सख्त रवैया दिखाते हुए राजस्थान के लिए स्वतंत्र और पर्याप्त अधिकारों से लैस रिवर कमीशन/रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी गठित करने का निर्देश दिया है। जोजरी नदी में औद्योगिक प्रदूषण और राजस्थान के नदी तंत्र की बदहाल स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने अपने फैसले में नदियों के प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को कई बड़े निर्देश दिए। केंद्र की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू और राज्य की तरफ से एएजी शिवमंगल शर्मा ने पैरवी की।

कोर्ट ने जोजरी-बांडी-लूणी नदी तंत्र के संरक्षण के लिए सात दिन में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप (ICG) बनाने को कहा है। साथ ही राजस्थान के लिए स्वतंत्र और पर्याप्त अधिकारों से लैस रिवर कमीशन/रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी गठित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि चीफ सेक्रेटरी राज्य के संबंधित डिपार्टमेंट के सीनियर अधिकारियों को शामिल कर सकते हैं, जिसमें एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट, वाटर रिसोर्स और इंडस्ट्री डिपार्टमेंट वगैरह शामिल हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि नदियों और पर्यावरण से खिलवाड़ करने वाले उद्योगों, अधिकारियों और सांठगांठ करने वाले तत्वों को बख्शा नहीं जाएगा।

दरअसल जोजरी नदी जोधपुर से होकर गुजरती है, बांडी नदी पाली से होकर बहती है और लूणी नदी बालोतरा से होकर बहती है। बांडी और जोजरी नदियां बालोतरा शहर के पास लूनी नदी में मिल जाती हैं  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जोजरी-बांडी-लूणी नदी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए नदी के पूरे कॉरिडोर की वैज्ञानिक पहचान और सुरक्षा जरूरी है। हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन निर्धारित होने तक चिन्हित नदी कॉरिडोर में नए औद्योगिक, व्यावसायिक अथवा आवासीय विकास की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने माना कि हाई फ्लड लाइन के वैज्ञानिक निर्धारण के अभाव में नदी तल, फ्लडप्लेन और आसपास के क्षेत्रों में अतिक्रमण तथा अनियंत्रित औद्योगिक विकास की स्थिति बनी। कोर्ट ने जोधपुर में बंद की गई इकाइयों को उनके आदेश के बिना शुरू नहीं करने का निर्देश दिया है। जोजरी नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर गत वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने प्रसंज्ञान लिया था। इसके बाद लगातार सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई पर राज्य के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास भी पेश हुए थे

सुप्रीम कोर्ट ने जोधपुर के कांकाणी में प्रस्तावित RIICO औद्योगिक क्षेत्र को लेकर  चिंता जताई। कोर्ट के सामने रखी गई समिति की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र का करीब 12.805 हेक्टेयर हिस्सा संभावित हाई फ्लड एरिया में आता है। प्रस्तावित टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट नदी क्षेत्र से करीब 30 से 60 मीटर की दूरी पर होने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में औद्योगिक गतिविधियों से औद्योगिक अपशिष्ट, सीपेज, बारिश के पानी और बाढ़ के जरिए प्रदूषक नदी तंत्र में पहुंचने का गंभीर खतरा है। ऐसे अगले आवंटन पर रोक लगाई है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर की वैज्ञानिक पहचान के बाद कांकाणी औद्योगिक क्षेत्र के लेआउट की व्यापक समीक्षा की जाए। यदि कोई हिस्सा नदी के फ्लडप्लेन या निर्धारित बफर क्षेत्र में पाया जाता है तो लेआउट में बदलाव, औद्योगिक भूखंडों को स्थानांतरित करने या अन्य जरूरी पर्यावरणीय और नियामकीय कदम उठाए जाएं। साथ ही किसी भी स्थिति में बिना उपचार या अपर्याप्त रूप से उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट को नदी तंत्र में जाने नहीं दिया जाए।
जोधपुर के सांगरिया सीईटीपी में जमा औद्योगिक अपशिष्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जमा पानी के नमूने लिए हैं और इसकी मात्रा का आकलन किया है। IIT जोधपुर से उपचार के लिए तकनीकी सुझाव लिए गए हैं। कोर्ट के समक्ष राज्य ने बताया कि IIT जोधपुर की सिफारिश के आधार पर वैज्ञानिक निगरानी में समयबद्ध और नियंत्रित रासायनिक उपचार शुरू किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी अनुमति के बिना औद्योगिक गतिविधियां दोबारा शुरू नहीं की जाएंगी।

कोर्ट ने SIT को जोजरी और अन्य नदी प्रदूषण से जुड़े मामलों की जांच और गहराई से करने को कहा है। SIT ने जोधपुर, पाली और बालोतरा जिलों में नदी प्रदूषण से जुड़े 16 आपराधिक मामलों की समीक्षा की है और चार FIR दर्ज होने की जानकारी दी है। जांच में CETP और औद्योगिक इकाइयों के बीच मिलीभगत के बिना उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ने की प्रथम दृष्टया संभावना सामने आने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच केवल अवैध डिस्चार्ज तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अधिकारियों, उद्योगों, CETP पदाधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जाए और विश्वसनीय साक्ष्य मिलने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
राजस्थान सरकार को इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप के गठन के बाद तीन सप्ताह के भीतर Comprehensive Resolution Plan सुप्रीम कोर्ट में पेश करना होगा। इसमें प्रदूषण नियंत्रण, नदी पुनर्जीवन, भूजल संरक्षण, जैव विविधता, निगरानी व्यवस्था और प्रत्येक विभाग की जिम्मेदारी व समयसीमा तय करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही पर्यावरणीय उल्लंघनों की शिकायत के लिए QR कोड आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का आदेश दिया है, जहां लोग फोटो, वीडियो और जियो-टैग्ड जानकारी के साथ नदी प्रदूषण, अवैध भूजल दोहन, नदी क्षेत्र में अतिक्रमण और खतरनाक कचरे की शिकायत कर सकेंगे। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी। उस दिन इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप की ओर से तैयार व्यापक कार्ययोजना पर विचार किया जाएगा।
कोर्ट ने पाया कि कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट और सदस्य औद्योगिक इकाइयों के बीच अनधिकृत पाइपलाइनों और ट्रीटमेंट प्रक्रिया को बाइपास करने में सांठगांठ थी। SIT को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 की गंभीर धाराओं के तहत बिना किसी दबाव के अधिकारियों और उद्योगपतियों की आपराधिक जवाबदेही तय करने के निर्देश दिये हैँ।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि राज्य सरकार की अनुपालन रिपोर्ट में RSPCB के दोषी अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का कोई जिक्र नहीं है। कोर्ट ने आदेश दिया कि दोषी अधिकारियों पर की गई या प्रस्तावित कार्रवाई का विवरण 3 दिनों के भीतर समिति के समक्ष पेश किया जाए।

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