नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ को लेकर कहा है कि उनकी किताब आने पर कुछ ‘तमाशा’ तो जरूर होगा। दशकों से दूसरे लोग उनकी कहानी बताते आए हैं, अब उनकी बारी है। सोशल मीडिया हैंडल इंस्टग्राम के बाद एक्स पर आने पर मंगलवार को डेढ़ मिनट के वीडियो में सोनिया गांधी यह भी बताया कि जब राजीव गांधी से प्रधानमंत्री बनने को कहा गया था, तब वे इसके पूरी तरह खिलाफ थीं।
अपनी किताब की चर्चा करते हुए सोनिया ने एक्स पर कहा कि उनके बारे में जो कुछ लिखा गया, उसमें बहुत कुछ गलत या बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, इसलिए उन्होंने तथ्य अपने शब्दों में रखने के लिए यह किताब लिखी। उन्होंने कहा कि लोगों की राय अलग-अलग होती है। किताब पढ़कर कुछ लोगों की राय उनके बारे में बदल सकती है और कुछ की और खराब भी हो सकती है। किताब लिखने और सार्वजनिक जीवन में रहने पर ऐसा होना स्वाभाविक है।
सोनिया गांधी अब तक किसी सोशल मीडिया मंच पर नहीं थीं। गुरुवार 22 अक्टूबर को वे इंस्टाग्राम पर आईं और पहली पोस्ट में किताब की पहली प्रतियां दिखाईं। शनिवार 24 अक्टूबर को उन्होंने X पर खाता शुरू किया। मंगलवार का वीडियो X पर उनकी दूसरी पोस्ट है। किताब 10 नवंबर को आएगी। भारत में इसे हार्परकॉलिन्स इंडिया छाप रहा है।
पहले वीडियो में सुनाई राजीव से मुलाकात की कहानी
X पर अपनी पहली पोस्ट में सोनिया ने बताया था कि राजीव गांधी से उनकी पहली मुलाकात इंग्लैंड के कैम्ब्रिज में ‘वर्सिटी’ नाम के एक ग्रीक रेस्टोरेंट में हुई थी। दोनों वहां पढ़ाई कर रहे थे और सोनिया इतालवी खाने की तलाश में उस रेस्टोरेंट तक पहुंची थीं। यह मुलाकात 1965 में हुई और 25 फरवरी 1968 को दोनों की शादी हुई। सोनिया ने बताया कि पहली मुलाकात में ही उन्हें लगा कि राजीव ऐसे इंसान हैं, जिनके साथ वे रहना चाहेंगी। बाद में पता चला कि राजीव भी ऐसा ही महसूस करते थे।
किताब में युद्ध के बाद के इटली में सोनिया के बचपन, कैम्ब्रिज में राजीव से मुलाकात, शादी के बाद नेहरू-गांधी परिवार और भारत के जीवन में ढलने का जिक्र है। परिवार पर टूटे दुख भी इसमें हैं। 1980 में संजय गांधी की विमान हादसे में मौत हुई, 1984 में इंदिरा गांधी और 1991 में राजीव गांधी की हत्या हुई। 2004 में प्रधानमंत्री पद न लेने का फैसला भी किताब का हिस्सा है।
राजीव की हत्या के बाद राजनीति से दूरी, फिर 19 साल अध्यक्ष
राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया कई साल सक्रिय राजनीति से दूर रहीं। 1997 में उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ली और मार्च 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनीं। वे 2017 तक लगातार अध्यक्ष रहीं, जो पार्टी के इतिहास में किसी अध्यक्ष का सबसे लंबा कार्यकाल है। 2019 से 2022 तक उन्होंने अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर फिर पार्टी संभाली।
2004 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने वाम दलों के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। सहयोगी दल सोनिया को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, जबकि भाजपा ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था। 18 मई 2004 को सोनिया ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद पार्टी ने मनमोहन सिंह को आगे किया, जो 22 मई को प्रधानमंत्री बने।