बांसवाड़ा। राजस्थान में प्रसूताओं की मौत के मामले लगातार जारी है लेकिन सरकार अभी तक तह में जाने में असफल साबित हुई है। कोटा, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, भीलवाड़ा के बाद बांसवाड़ा में भी प्रस्ताव की मौत के मामले सामने आए हैं।
बासवाड़ा जिले के सबसे बड़े महात्मा गांधी अस्पताल के मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र में चार दिनों के भीतर चार प्रसूताओं की मौत होने से चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। लगातार सामने आए इन मामलों के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। जिला प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के लिए पांच वरिष्ठ डॉक्टरों की विशेष समिति गठित कर दी है। वहीं, जयपुर से भी विशेषज्ञ चिकित्सकों को जांच के लिए बुलाया जा रहा है।
जिला कलेक्टर डॉ. इंद्रजीत यादव ने पुष्टि करते हुए बताया कि चार मौतों के अलग-अलग मामलों की विस्तृत जांच कराई जा रही है। शुरुआती जानकारी के अनुसार दो मरीज पहले से ही गंभीर स्थिति में थीं, जबकि दो मामलों में ऑपरेशन के बाद अचानक स्वास्थ्य बिगड़ गया। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मौतों के वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकेंगे।
इधर अस्पताल प्रशासन पर पूरे मामले को दबाने के आरोप भी लगे हैं। बताया जा रहा है कि शुक्रवार को इस संबंध में जानकारी मांगने पर अस्पताल प्रशासन ने ऐसे किसी मामले से इनकार किया था। बाद में जिला प्रशासन ने चार मौतों की पुष्टि की। 7 जुलाई से 10 जुलाई के बीच कुल चार प्रसूताओं की मौत हुई। इनमें दो महिलाओं को गंभीर हालत में अन्य अस्पतालों से रेफर कर एमजी अस्पताल लाया गया था, जबकि दो महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी के बाद तबीयत बिगड़ने से मौत हो गई।
इसी बीच अरथूना क्षेत्र के कानेला गांव निवासी 25 वर्षीय लीला खांट की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं परिजनों के अनुसार लीला की सिजेरियन डिलीवरी सफल रही थी और रात तक वह पूरी तरह सामान्य थी। उसने अपने पति, सास और अन्य परिजनों से बातचीत भी की थी, लेकिन सुबह अचानक अस्पताल प्रशासन ने बताया कि उसका ब्लड प्रेशर बेहद कम हो गया है और उसे आईसीयू में भर्ती कर दिया गया। कुछ ही देर बाद उसकी मौत की सूचना दे दी गई।
मृतका के जेठ संजय खांट ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि लीला का हीमोग्लोबिन लगभग 12 था, जो सामान्य माना जाता है। इसके बावजूद डॉक्टरों ने खून की कमी बताते हुए चार यूनिट रक्त की व्यवस्था करने को कहा। परिजनों ने रक्त की व्यवस्था भी कर दी, लेकिन आरोप है कि वह रक्त महिला को चढ़ाया ही नहीं गया और बाद में उसकी मौत हो गई।
परिजनों का यह भी कहना है कि डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि मरीज के बचने की संभावना केवल 10 प्रतिशत थी। परिजनों ने अस्पताल पर यह भी आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई और लंबी कानूनी प्रक्रिया का डर दिखाकर उनसे लिखित में पोस्टमार्टम नहीं कराने की सहमति ले ली गई, जिसके बाद बिना पोस्टमार्टम शव परिजनों को सौंप दिया गया। इससे मौत के वास्तविक कारण सामने नहीं आ सके। लीला की शादी करीब दो वर्ष पहले हुई थी. वह और उसके पति विजय खांट दोनों बीए-बीएड शिक्षित हैं। इस घटना के बाद पूरे परिवार में शोक का माहौल है।
जिला कलेक्टर डॉ. इंद्रजीत यादव ने बताया कि मौतों की वजह जानने के लिए पांच वरिष्ठ चिकित्सकों की उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई गई है। ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण, दवाइयों के संभावित रिएक्शन, एनेस्थीसिया प्रक्रिया और सभी मेडिकल रिकॉर्ड की जांच कराई जा रही है। ओटी से सैंपल भी लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
राजस्थान में प्रसूताओं की मौत का मामला हाल के महीनों में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में उभरा है, जिसने राज्य की सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भीलवाड़ा के महात्मा गांधी सरकारी अस्पताल में छह दिनों के भीतर पांच प्रसूताओं की मौतों ने प्रशासन को हिलाकर रख दिया है। इससे पहले मई और जून के महीनों में भी कोटा, बीकानेर और जोधपुर के सरकारी अस्पतालों से प्रसूताओं की मौत और किडनी फेल होने के मामले सामने आए थे।