जयपुर। एसीबी की ओर से पूर्व मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी का कारण और गिरफ्तारी का आधार अलग-अलग बातें हैं। एसीबी ने केवल एफआईआर व धाराओं का उल्लेख कर गिरफ्तारी की, जबकि आरोपी को यह बताना जरूरी है कि उसकी भूमिका क्या है और गिरफ्तारी क्यों जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि एसीबी को गिरफ्तारी करने के कारणों की मूलभूत समझ तक नहीं है।
जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने एसीबी कोर्ट के पीठासीन अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया और कहा कि आरोपी ने 7 मई को ही प्रार्थना पत्र पेश कर गिरफ्तारी की वैधता पर आपत्ति उठाई थी। इसके बावजूद संबंधित पीठासीन अधिकारी ने रिमांड देते हुए प्रार्थना पत्र को 31 दिन लंबित रखा। अदालत ने पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण की जरूरत बताते हुए आदेश की कॉपी हाईकोर्ट प्रशासन व एसीएस गृह विभाग को भेजी है।
जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने यह आदेश रोहित जोशी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विस्तृत आदेश जारी करते हुए दिए। हालांकि, अदालत ने कहा कि एक बार न्यायिक रिमांड हो जाने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए शुरुआती गिरफ्तारी की वैधता को सीधे चुनौती नहीं दी जा सकती।
अदालत ने कहा कि एसीबी कोर्ट की ओर से प्रार्थना पत्र तय करने वाले 8 जून के आदेश को अलग से चुनौती दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया, जिससे साबित हो कि गिरफ्तारी के आधार बताए गए हों। केवल गिरफ्तारी के आधार बताना पर्याप्त नहीं है।
याचिका में अधिवक्ता स्नेहदीप ने बताया कि याचिकाकर्ता के पिता को गिरफ्तार करते हुए एसीबी ने गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए, जबकि कानूनन इसके आधार बताना जरूरी है. इसलिए पिता की गिरफ्तारी अवैध है। लिहाजा पिता को रिहा किया जाए। इसके अलावा उनकी ओर से पहली बार पेशी के दौरान एसीबी कोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश कर इस संबंध में आपत्ति पेश की गई थी, लेकिन उसे करीब एक माह तक तय नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को गत दिनों संक्षिप्त आदेश से खारिज करते हुए विस्तृत आदेश अलग से देना तय किया था।