पेपर लीक: शिक्षा व भर्ती तंत्र की साख पर चोट
– यदि व्यवस्था भ्रष्टाचार और पेपर लीक से प्रभावित होती रही तो लाखों युवाओं का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं से उठ जाएगा। इसलिए पेपर लीक को केवल अपराध नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य के खिलाफ साजिश मानते हुए कठोर और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है।
हाल ही में एक बार फिर पेपर लीक माफिया ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट का पेपर लीक कर दिया है। इसके बाद नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा पर सवाल उठना केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता पर संकट नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा और भर्ती तंत्र की साख पर चोट है। पिछले पांच वर्षों में राजस्थान सहित देशभर में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक के दर्जनों मामले सामने आए हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा उन युवाओं को भुगतना पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत करके परीक्षाओं की तैयारी की। नीट की परीक्षा रद्द कर भले ही इसे दोबारा से करवाया जा रहा हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिरकार इन लाखों बच्चों के भविष्य और उनके परिवार के सपनो का सौदा आखिर कब तक होता रहेगा? इसकी जिमनेदारी किसकी है, जबकि परीक्षा एजेंसियों औऱ कोचिंग हब में बैठे माफिया इनमें स्पष्ट रूप से लिप्त हैं।
एक जांच के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में देश के 15 राज्यों में कम से कम 41 बड़ी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक या धांधली के मामले सामने आए। इनसे करीब 1.4 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए। वहीं कुछ स्वतंत्र अध्ययनों में 2015 से 2025 के बीच 70 से अधिक पेपर लीक मामलों का उल्लेख है, जिनसे 1.7 करोड़ से ज्यादा छात्र और नौकरी अभ्यर्थी प्रभावित हुए। राजस्थान भी इस संकट का बड़ा केंद्र रहा है। यहां रीट, सेकंड ग्रेड शिक्षक भर्ती, सब इंस्पेक्टर भर्ती, वन रक्षक भर्ती, एलडीसी भर्ती, कांस्टेबल, जेईएन, लाइब्रेरियन, सीएचओ सहित कई अन्य परीक्षाओं में पेपर लीक या नकल गिरोह सक्रिय पाए गए। कई परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं और लाखों युवाओं को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। इससे न केवल समय और धन की बर्बादी हुई, बल्कि युवाओं का मानसिक संतुलन भी प्रभावित हुआ।
पेपर लीक का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि मेहनती और ईमानदार अभ्यर्थियों का विश्वास टूट जाता है। एक छात्र कई वर्षों तक कोचिंग, किताबों और प्रतियोगी माहौल में खुद को तैयार करता है। परिवार आर्थिक दबाव झेलता है। कई अभ्यर्थी गांव छोड़कर शहरों में रहकर तैयारी करते हैं, लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र बाजार में बिकने लगें तो मेहनत का मूल्य समाप्त हो जाता है। इससे युवाओं में निराशा, अवसाद और व्यवस्था के प्रति गुस्सा पैदा होता है। पेपर लीक केवल परीक्षा रद्द होने तक सीमित समस्या नहीं है। इसका असर युवाओं के पूरे कॅरियर पर पड़ता है। एक परीक्षा रद्द होने का मतलब है भर्ती प्रक्रिया में कई महीनों या वर्षों की देरी। इस दौरान अभ्यर्थियों की आयु सीमा पार हो सकती है। कई युवा लगातार असफल भर्ती प्रक्रियाओं से मानसिक रूप से टूट जाते हैं। कुछ अभ्यर्थी निजी नौकरियों में चले जाते हैं, जबकि कई प्रतियोगी परीक्षाओं से ही दूरी बना लेते हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि पेपर लीक अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है। जांच एजेंसियों की रिपोर्टों में सामने आया है कि इसमें कोचिंग सेंटर, प्रिंटिंग प्रेस, परीक्षा केंद्रों के कर्मचारी, तकनीकी विशेषज्ञ और बिचौलियों का नेटवर्क शामिल रहता है। सोशल मीडिया और मैसेजिंग एप के जरिए मिनटों में प्रश्न पत्र वायरल कर दिए जाते हैं। कई मामलों में करोड़ों रुपए के लेनदेन सामने आए हैं। नीट पेपर लीक के हालिया मामले ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय परीक्षाओं की सुरक्षा आखिर क्यों कमजोर पड़ रही है।
देशभर में लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर परीक्षा देते हैं, लेकिन यदि परीक्षा की निष्पक्षता ही संदिग्ध हो जाए तो पूरी चयन प्रक्रिया पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। इससे योग्य छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है और व्यवस्था में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। पेपर लीक की घटनाएं केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ाती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर छात्र केवल मेहनत के भरोसे प्रतियोगिता में आते हैं, जबकि पैसे के दम पर पेपर खरीदने वाले गलत तरीके से आगे निकल जाते हैं। इससे प्रतिभा और परिश्रम की जगह भ्रष्टाचार और धनबल को महत्व मिलने लगता है।
हालांकि सरकार ने इस समस्या को रोकने के लिए सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 लागू किया है। इसमें पेपर लीक कराने वालों के लिए 3 से 10 साल तक की सजा और एक करोड़ रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है, लेकिन केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी। पेपर लीक माफिया में इस कानून का डर ही नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार जरूरी हैं। प्रश्न पत्रों की डिजिटल एन्क्रिप्टेड ट्रांसमिशन व्यवस्था लागू करनी होगी। परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन और लाइव निगरानी जरूरी है। पेपर प्रिंटिंग और वितरण प्रक्रिया को पूरी तरह सुरक्षित बनाना होगा। परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करनी होगी। साथ ही पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बननी चाहिए, ताकि दोषियों को जल्द सजा मिल सके।
इसके अलावा भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की संख्या कम करके एकीकृत परीक्षा प्रणाली विकसित करने पर भी विचार होना चाहिए। इससे बार-बार पेपर तैयार करने और वितरण की प्रक्रिया कम होगी। तकनीक आधारित कंप्यूटर परीक्षाओं को बढ़ावा देना भी एक समाधान हो सकता है। देश के युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरी या प्रवेश का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनके सपनों और भविष्य की नींव हैं। यदि व्यवस्था भ्रष्टाचार और पेपर लीक से प्रभावित होती रही तो लाखों युवाओं का विश्वास लोकतांत्रिक संस्थाओं से उठ जाएगा। इसलिए पेपर लीक को केवल अपराध नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य के खिलाफ साजिश मानते हुए कठोर और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है।
डॉ मोनिका शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार